आधे- अधूरे | मोहन राकेश | नाटक | आधे- अधूरे... हम सब की तरह |

एक घर, उसमें रहने वाले कुछ लोग और उनकी ज़िंदगी के इर्द गिर्द घूमते संवाद। संक्षेप में तो यह नाटक यही है। परंतु क्या सच में यह नाटक भी इस पंक्ति के जितना ही सतही है? या कुछ और भी है इस नाटक में जो थोड़ा गहरा है, जिसे इन कुछ शब्दों से नहीं समझाया जा सकता है।

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आधे अधूरे इस नाटक का नाम शायद इसीलिए पड़ा होगा क्यूँकि इस नाटक में सबकी इच्छाएँ अधूरी है और सबको अपनी इन इच्छाओं को पूर्ण करने की दौड़ में जो हताशा हाथ लगती है उसके लिए वो एक दूसरे पर सारा दोष मढ़ने को हर वक़्त तैयार रहते हैं। यहाँ तक कि इनके तो संवाद भी अधूरे अधूरे से हैं, पूर्ण होने की कगार पर आकर वापिस लौट आते हैं हर बार। जैसे अपनी ही कड़वाहट को भांप लेते हों।

सावित्री, इस घर की करता धरता, जो नौकरी भी करती है और पूरे घर को संभालती भी है। उसे हमेशा से ही अपने लिए एक पूर्ण पुरुष की तलाश रही है जो अच्छी नौकरी करता हो, अच्छी इज्जत हो जिसकी, जिसके साथ वो अपने आप को बड़ा महसूस कर सके परंतु उसका पति महेन्द्रनाथ ऐसा नहीं बन सका और इसीलिए वो उसे देखकर खीजती है।

खुद कुछ भी काम ना कर पाने की शर्म से महेंद्रनाथ अपने को और भी छोटा महसूस करता है जब भी सावित्री अपने पुरुष मित्रों को घर लाती है। इससे उसे और भी ज़्यादा खीज आती है सावित्री से।

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परंतु यदि महेन्द्रनाथ की जगह सावित्री का ब्याह किसी और से हुआ होता तो क्या सावित्री के जीवन की परिस्तिथियाँ कुछ अलग होती? क्या वो ज़्यादा खुश, सम्पन्न और संपूर्ण महसूस करती? यह सवाल सामने आकर बार बार मन को कुरेदता रहता है।

अशोक, जो बच्चों में सब से बड़ा है और घर का इकलौता लड़का है, उसे सिर्फ़ magazine से अभिनेत्रियों की तस्वीरें काटने के अलावा और कोई काम नहीं। वो भी अपनी बहन बिन्नी की तरह ही इस घर से दूर भाग जाना चाहता है, उसे भी एहसास है कि इस घर में कुछ तो है जो उनके जीवन को रोके रखा है। उसे अपने पिता से ज़रूर थोड़ी हमदर्दी है परन्तु बाकी किसी भी सदस्य से कोई लगाव नहीं। पता नहीं क्यूँ पर मुझे अशोक का पात्र अपनी खामियों के बावजूद भी बहुत ही honest लगा। वही एक ऐसा था उस पूरे घर में जो अपने जीवन की सच्चाई को accept कर चुका था और ऐसी बातें जो बहुत कड़वी हैं पर ज़रूरी भी उन्हें कहने से हिचकता नहीं था।

अब बात हो जाये मेरे सबसे पसंदीदा पात्र की, छोटी लड़की किन्नी। महज़ तेरह वर्ष की उम्र मगर ज़ुबान ऐसी की कैंची भी शर्मा जाए। उसके तीखे dialogue गुदगुदा देते हैं अपने अंदाज़ से। उसका जीवन भी घर की बिखरी परिस्थितियों से अछूता नहीं, खुद को घर में अक्सर अकेला पाकर और अपनी ज़रूरतों को नज़रंदाज़ होता हुआ देखकर उसकी रुचि उन बातों में बढ़ने लगी हैं जो उसकी उम्र के हिसाब से ठीक नहीं।

सावित्री और महेंद्रनाथ दोनों ही ऐसे पात्र है जिनके बारे में कोई एक राय नहीं बनाई जा सकती। नाटक की शुरआत में मुझे सावित्री और महेन्द्रनाथ दोनों से ही कुछ कुछ हमदर्दी होती है पर जैसे ही पूरी कहानी का दृष्टिकोण बदला और हमे दोनों ही पात्रों के व्यक्तित्व के दूसरे पहलू देखने को मिले तो समझना बहुत मुश्किल हो गया कि आखिर इन सब में सही कौन है और गलत कौन है। मेरे ख्याल से तो ये सवाल पूछना भी बेकार है, किसी भी व्यक्ति या पात्र को इन दो भागों में बांट पाना सम्भव नहीं है।

मैंने इस नाटक को पढ़ने के बाद सोचा भी की अगर इस नाटक में लेखक ने किसी एक पात्र पर, मानो महेन्द्रनाथ पर ही सभी दोषों का ठीकरा मढ़ दिया होता तो यह नाटक कितना सतही और असल जीवन से कितना दूर हो गया होता। क्या असल जीवन में दोष हमेशा सिर्फ़ एक ही व्यक्ति का होता है? क्या एक व्यक्ति किसी परिस्तिथि में पूर्ण रूप से सही होता है और दूसरा व्यक्ति पूर्ण रूप से गलत?

शायद यही सारे सवाल मोहन राकेश भी हम सब के सामने रखना चाह रहे थे अपने इस नाटक के द्वारा ताकि हम उन्हें अपनी ज़िंदगी से जोड़कर उनके बारे में सोचें। उन्होंने बहुत अच्छे से संवादों का इस्तेमाल करते हुए सभी पात्रों के अलग अलग पहलू दर्शाने की कोशिश करी है। उनकी खामियाँ ,उनकी खूबियाँ और उनकी इच्छएँ सब हमारे सामने प्रत्यक्ष खड़ी घूरती है हमें।

तो पढ़ो इसे, यह नाटक हम सब के जीवन की कहानियों से ज्यादा भिन्न नहीं है, हम सब भी किसी न किसी रूप में आधे अधूरे हैं।

तो अगर कुछ बेहद सच और खुद से जुड़ा हुआ पढ़ना है तो आधे- अधूरे पढ़ें।  

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तब तक पढ़ते रहिए। 

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