चलता - फिरता प्रेत | मानव कौल | निजी मैं की यात्रा

ये review नहीं है (मैं इस काबिल नहीं।), ये recommendation भी नहीं है (बिना recommend किये पढ़ लेना), ये किताब के बारे में नहीं है। ये मेरे बारे में है। मेरे ‘भीतर’ के बारे में है – जो कुछ चला है ये किताब पढ़ते हुए। तो अगर अब भी पढ़ना है तो स्वागत है – मानव कौल की किताब चलता – फिरता प्रेत के साथ मेरे भीतर की यात्रा में।  

चलता – फिरता प्रेत के साथ पहला दिन

झूठ सुनहरा था, भूस की तरह, सत्य उसमे काले सांप की तरह घुस गया। हम डर गए। बहुत। इतना डर गए कि लाठी लेकर भूस के ढेर में सांप मारने लगे। सारा घर भूस के तिनकों से भर गया। दीवार, छत, खिड़की, दरवाजे और हम – सब छोटे छोटे भूस के तिनकों के बीच छिप गए। सांप हाथ नहीं आया… रात में थककर सोने पर पैरों पर कुछ रेंगता महसूस हुआ और हम अकड़ गए, हमने डर कर हाथ जोड़ लिए, तभी कानों में फिस्फिसाती सी आवाज़ आई – ‘डरो मत, मैं तुम्हें नहीं काटूंगा। तुम पर अब भी झूठ के तिनके बिखरे हुए हैं। अभी तुम सत्य के काटे से जीने लायक नहीं हुए।’

और फिर वो चला गया… और हम सुकून से मरते रहे अपने भूस के साथ।

किताब आते ही एक चुप्पी आयी है। सिर्फ भूमिका पढ़ी है। आगे पढ़ने से डर लग रहा है – मृत्यु जैसा डर। लिखा है कि ये कहानियां मृत्यु शब्द के आस पास लिखी हैं। क्या हर मृत्यु अपने आस पास इतनी चुप्पी मांगती है? और लिखा है कि ये कहानियां मौन के बीच की चुप्पी हैं – तब तो मुझे अपना मौन इन कहानियों के मौन से मिलाना पड़ेगा, वरना तो धोखा होगा ना? किताब पढ़ने की बहुत चाह है – पर उससे कहीं ज्यादा डर… ये डर उस काले सांप का है जो मेरे जीवन के सुनहरे भूस में आ गया है – नहीं, जिसे मैंने बुलाया है और अब डर लग रहा है – अब या तो मैं लाठी लेकर भूस बिखेरूं या मौन रहकर काटे जाने का इंतजार करूं! पर डर बहुत है।

दूसरा दिन..

डरते डरते रात के सन्नाटे में दो कहानियां पढ़ ली हैं। कहानियों के शब्द बुदबुदाते हैं कानों में। आत्मा के कुएं में हर शब्द टप टप की आवाज़ सा गिरता है, अंदर कुछ बहुत देर तक गूंजता रहता है। घोड़ा कहानी के पात्र निजी जीवन में देखें हैं… दूसरी कहानी में कितना सच है कितनी कल्पना – परिधि पर चलती कहानी। यही तो हम जी रहे हैं – नहीं हम नहीं, शायद मैं – शायद सिर्फ परिधि पर चलने का भ्रम है। पर ये भ्रम भी कितना सुन्दर है। कहानी पढ़ के बड़ा मन किया कि ये मेरे साथ हो पर फिर डर गया कि कितना दुखद है ये। पर इस दुख के अंदर कुछ चमत्कार सा बैठा है जो बार बार अपनी ओर बुलाता है। तबसे उस चमत्कार के इर्द गिर्द घूम रहा हूं। हर कहानी के साथ सांप का डर बढ़ रहा है।

तीसरा दिन…

पूरे दिन कहानी अपने पास बुलाती रही पर टालता रहा। वहीं सांप का डर। पर अंत में दबे क़दमों से जाना पड़ा। थोड़ा पढ़ते ही कुछ अंदर घुमड़ने लगा – कितना निजी, निजी रह जाता है और कितना कहानी का हिस्सा, वो कौनसा बिंदु जहां छूकर कहा जा सकता है कि देखो यहां से असल जीवन शुरू है और यहां से दूसरी तरफ सिर्फ कहानी है – और अब चुन लो। चुनाव ना कर पाना कहानी को तिलिस्म बना देता है जिसके सपने बचपन से बहुत देखे हैं – तिलिस्म को पूरा खोलने का खयाल हाथ पकड़ता है पर मैं तिलिस्म की सुंदरता में इस कदर खोया हूं वो पकड़ ढीली पड़ जाती है। बहुत धीमे से सांप बुदबुदाता है – तुम अभी इस परिधि पर नहीं चल सकते जहां असल और कहानी को एक कर सको और अंदर कोई बहुत तेज़ रोता है।

रोना और ना बढ़े का डर जल्दी से अगली कहानी पर ले जाता है। कायरता – नाम का सबसे पहला पत्थर मन के भीतर गूंजता है। सब सरल होने के बावजूद हमें कठिन जीने की आदत है – इसके विपरीत जीत ही ऐंठन होती है। और जलन की पहली पीड़ा – ऐसा मैं कब जी पाऊंगा का प्रश्न कनपटी पर देर तक ठक ठक करता रहता है।

चौथा दिन….

कुछ इतना निजी पढ़ कर लगता है कि ये सब किसी एक समय में मेरे साथ हो चुका है। ये एक एक संवाद, ये एक एक चुप्पी मैंने जी है। ये मेरी कहानी है। अपनी कहानी जीने के लिए दो बार और पढ़ी कुछ कहानियां। कुछ कहानियां इतनी निजी हो जाती हैं लगता है ये हम हैं – कोई दूसरा एक एक शब्द से हमें लिख रहा है और हम उसे चाहकर भी नहीं रोक सकते क्योंकि जो लिखा जा रहा है वो बहुत सुंदर है – इतना सुन्दर जितना हम जी नहीं सकते। लाख कोशिशों के बाद भी।

कहानियाँ खत्म होने के बाद भी किताब खुली रहती है और मैं बहुत देर चुप रहता हूँ।

“मैं वापस नहीं जाना चाहता।” मैं आस- पास से चुप्पी तोड़ते हुए कहता हूं।

सांप फुसफुसाता है – “पर जाना पड़ेगा, अभी तुम इस दुनिया में हमेशा के लिए रहने के काबिल नहीं हुए। इस संसार में रहने के लिए अभी तुम्हे बाहर और जीना है, अभी अपने को और उधेड़ना है। ये वाले तुम इस संसार के काबिल नहीं। वक़्त लगेगा नया ‘मैं’ बनने में।”

“मैं वापस तो आ सकता हूं ना?” मैं फुसफुसाते हुए पूछता हूँ। डर है कि जवाब ‘ना’ में आएगा।

“तुम रोक पाओगे खुद को?” एक खामोश हंसी हर जगह गूंज जाती है।

वो दिन बहुत पास से ताकता हुआ नजर आता है जब मैं फिरसे इसे खोलूँगा। फिरसे इस संसार में कदम रखूँगा। मैं मुस्कुराते हुए किताब बंद कर देता हूं।


बस इतना ही। इससे ज्यादा लिख नहीं सकता। एक जगह पर आकर शब्द जो महसूस हो रहा है उसके आगे फीके पड़ जाते हैं। जबरदस्ती करके इससे ज्यादा लिखना झूठ की तरफ चला जाएगा और मैं झूठ लिखने के काबिल भी नहीं हूँ। 

बस इतना कहूँगा – पढ़ लो। कुछ बेहद निजी है। बेहद सुंदर है। Quotes नहीं डालूँगा क्यूंकि… खुद से पढ़ो। इतना निजी है बांटने का मन नहीं है।

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P.S. बहुत आभार अभिषेक को जिन्होंने is post के लिए फोटो click कर के दी। – ये instagram पर लिखते भी हैं। आप इन्हें वहाँ पढ़ सकते हैं। – Abhishek

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