अपने बारे में बताने की सबसे अच्छी शुरुआत होती है ये बताने से कि हम क्या नहीं हैं – तो पहले उसका जवाब। 

हम क्या नहीं हैं?

हम समीक्षक/आलोचक (reviewer/critic) बिल्कुल भी नहीं हैं। ना ही किताबों के, ना कहानियों के, ना कविताओं के और ना फिल्मों के। 

तो फिर हम क्या हैं? कौन हैं?

कतई सरल शब्दों में कहा जाए तो हम वो कुछ दोस्त हैं जो पढ़ते हैं और कुछ चीज़े underline करते हैं और फिर मन होता है कि अपने दोस्तों को बताएँ कि यार ये किताब पढ़ो, बड़ी सही है। ये कविता पढ़ो, बहुत मजा आएगा। ये किताब, वो किताब, ये कहानी, वो कविता इट्सएट्रा यानि कि etc यानि कि इत्यादि।

हम बस वो कुछ लोग हैं जिन्हे साहित्य पढ़ने और देखने का कुछ ज्यादा ही चस्का है और जब भी कुछ अच्छा पढ़ते या देखते हैं तो जैसे अपने निजी दोस्तों को बताने का मन करता है वैसे ही सोचा online दोस्तों को बता दें। थोड़ा वो कुछ अच्छा पढ़ लेंगे और देख लेंगे। इसमे थोड़ा हमारे साहित्य को बढ़ावा मिल जाएगा और बाकी कुछ नहीं।

Same फिल्म्स के साथ – हमें उन्हीं दोस्तों की category में रख लो जो खूब फिल्म्स देखते हैं और जब भी कोई फिल्म अच्छी लगी तुरंत चले आते हैं बताने कि यार ये वाली फिल्म देखो, बड़ी सही है। और इन इन वजह से देखो।

किसी की आलोचना (criticism) या समीक्षा (review) देना ना तो उद्देश्य है और ना अभी उतनी समझ। अगर लेख में ऐसा कुछ लगता भी है तो वो हमारी लिखने की कमी है। उसे seriously ना लेना।

अब आते हैं थोड़े philosophy वाले इन्ट्रो पर। काहे कि intellectuality झाड़ने में मजा आता है।

हम यात्री हैं। बस। साहित्य की यात्रा के बीच कविता, लेखन पर बात चीत, उन्हे पढ़ना, समझना और दूसरों तक अगर पहुँच सके तो पहुंचाना इससे बड़ा कोई उद्देश्य नहीं। हम वो चिड़िया हैं जो साहित्य के दाने चुग के इधर उधर से लाते हैं। और फिर इस कोलाहल से दूर एक शांत बरगद के नीचे चौपाल जमा में बैठते है और बस उन दानों पे चिचियाते हैं।

Idea ये था कि कोई ऐसा जगह हो जहाँ पर बैठकर साहित्य पर चर्चा हो सके। कैसा भी साहित्य- इस देश का या पूरी दुनिया। बस चर्चा। बहुत सुंदर बात कही है किसी ने – “किसी चीज को नकारने का अधिकार उस चीज को जानने के बाद मिलता है।” अब अगर कविता को नकारना है तो पहले उसे पढ़ना पढ़ेगा। और ये होना भी चाहिए। एक चौपाल के सारे लोग इस बात में विश्वास रखते हैं।

एक चौपाल नाम इसलिए रखा क्यूँ चौपाल में हर बात पर चर्चा की संभावना रहती है। और चौपाल से बचपन का संबंध रहा है। कभी ना कभी हम सभी ने गाँव की चौपाल पर खूब वक़्त बिताया होगा – खेले होंगे, कूदे होंगे, लड़े होंगे, फिर अगले दिन वहीं सुलह हुई होगी, दादा नाना से कहानियाँ सुनी होंगी, दूसरों की कहानियाँ सुनी होंगी। अब भले वो चौपाल यादों में हो पर वो बड़ी अपनी लगती है।

साहित्य भी तो यही है। कुछ ऐसा जो हमें हमारे भीतर के बच्चे से जोड़ता है। तो इसकी एक चौपाल क्यूँ ना हो। तो हम एक चौपाल की तरफ से आपका स्वागत करते हैं कि आप आईए – इस चौपाल में शामिल होइए और आइए बात करते हैं।

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