Dekalog : Krzysztof Kieślowski | Life Changing, Mesmerizing, Otherworldy

चुप्पी का सबसे सुंदर रूप सोचो : फिर सोचो कुछ उससे भी ज्यादा सुंदर : सोचो, हर व्यक्ति सवालों के घेरे में लड़कर जीता है : जानो, चक्रव्यूह में फंसा अभिमन्यु सिर्फ महाभारत में ही नहीं होता: हर कोई अभिमन्यु है अपने जीवन का : ईश्वर रणभूमि में होकर भी तुम्हारे युद्ध में हस्तछेप नहीं करते : वो बस देखते हैं तुम्हारी कर्मठता और तुम्हारे चुनाव।

Dekalog Polish फिल्म डायरेक्टर Krzysztof Kieślowski की 1988 की टीवी सीरीज है जिसने उन्हें world famous बनाया था। इसमें दस एपिसोड हैं। और ये इरफ़ान के favourite डायरेक्टर थे तो देखना शुरू की थी। देखने के बाद हर एपिसोड में जो महसूस किया है वो नीचे लिख रहा हूँ। बाकी बाद में।

Dekalog : One

हम कोशिश कर के गिन लें अनंत को : हर बार उंगलियां कम पड़ जाती हैं : कांपती है, सुन्न हो जाती है देह, नहीं याद रहता कि तुम तुम हो : जब आता है दुख, जिसको किसी मीटर पर गिना नहीं जा सकता और गले लगा लेता है : हम पहुंचते हैं तब अनंत के सामने और पूछते हैं पहला सवाल जिसके जवाब में चुप रहता है, कुछ नहीं कहता, बस रोता है ईश्वर।

Dekalog: Two

वो डॉक्टर जिसने चुनी नई जान पुरानी के ताक पर : उसका चुनाव : एक का जीवन, एक की मृत्यु : चुनाव जीवन दे भी सकता है और ले भी सकता है : चुनाव ईश्वर बनाता है क्या? ईश्वर के लिए कितना कठिन होता है चुनाव? क्या ईश्वर को याद होंगी श्रृष्टि के बनने से लेकर आज तक के चुनाव में आहुति की तरह दी गईं जाने : क्या इसे याद करके ईश्वर बनता होगा बेहतर मनुष्य? चुनाव दूसरा प्रश्न है जिसके उत्तर में फिर चुप रहता है ईश्वर।

Dekalog: Three

किसी को तुम्हारे साथ की जरूरत हमेशा रहेगी : धोखा देना कभी कभी साथ रहने की मजबूरी में उठाया कदम भी हो सकता है : ये जानते हुए कि दुनिया एक खूबसूरत धोखा है, तुम विश्वास करते हो और धोखा खाते हुए मनुष्यता का धर्म निभाते हो : दो आंखें देखती हैं तुम्हें किसी और के धोखे में बंधते हुए और कुछ नहीं कहती, बस स्वीकार लेती हैं तुम्हारा मनुष्य होकर वापस लौटना : वो आंखे ईश्वर की आँखें हो जाती हैं क्या?

Dekalog: Four

वो सारे खत जो जला दिए गए पढ़े बिना ही : उनका धुआं चिपक जाता है आत्मा के फेफड़ों पर : और रह रह कर आती है खांसी तब याद आते हैं वो सारे शब्द जो उन खतों में लिखे थे : प्रेम सारा कुछ कहकर कुछ ना कहने की कला भी हो सकता है : प्रेम एक झूठा लिखा पत्र भी हो सकता है जो तुम जानबूझकर सत्य मान लेते हो।

Dekalog: Five

कानून के कटघरे में लगे होने चाहिए शीशे जिसमें दिख सके अपनी असलियत : ज्ञान हमेशा ही प्रकाश नहीं लाता : बस बताता है कि अभी अंधकार है और प्रकाश जैसा भी कुछ होता है : कोई यूंही नहीं कर देता है खून किसी का : वो बस सोना चाहता है अपने पिता की कब्र के ऊपर : बस इतनी सी इजाज़त मांगता है अपनी मां से ठीक मरने से पहले : गुनाह करने का पता चलना और उसके लिए घुट घुट कर खुदको घृणा से देखना ही काफी नहीं होता : बहुत बार मरना भी पड़ता है प्रायश्चित के लिए।

Dekalog: Six

किसी को देखना : बस देखना : दूर से : बिना हस्तछेप के : कुछ भी ना मांगना : ना कहना : बस कभी कभी बहाने से झूठा पत्र डालकर बुलाना : वो भी इसलिए कि देखना है : प्रेम सिर्फ देखने तक ही सीमित भी रह सकता है : और जब वो प्रेम अपने देखने पर भी शर्मिंदा हो जाए तब? उसके जवाब में देखने के सिवा कुछ क्यूँ नहीं करता ईश्वर?

Dekalog : Seven

जो तुम्हारा है उसे कैसे चुराओगे तुम : आधिपत्य एक मन: स्थिति है : उसे जताने के लिए कितने जतन करोगे तुम : और जिस पर आधिपत्य जताना है वो तुम्हे ‘अपना’ ना चुने तब! : मातृत्व भी हक की लड़ाई हो सकती है! : इसके जवाब में ईश्वर बस देखता है एक बच्ची का ट्रेन ताकना : जिस पर बैठी है वो लड़की जो उसकी माँ हो सकती थी।

Dekalog : Eight

टीस बना सकती है बेहतर मनुष्य : पर क्या करोगे जब टीस जीती जागती आ जाए सामने : पूछे सवाल कि क्यूं किया था सालों पहले वो काम : ऐसा क्या देखा होगा उन बूढ़ी आंखों ने बीते सालों में जो अब अपने सामने आए प्रायश्चित को भी पहचानने से इंकार करती हैं : कुछ दुख, कुछ टीस : जीना प्रायश्चित से ज्यादा आसान होता है : बहुत बार बूढ़ी आँखों से नजरंदाज भी करता है ईश्वर।

Dekalog : Nine

तुम कहते हो प्रेम में कुछ चीजें ना कहना ही अच्छा है : फिर क्यूं उधेड़ते हो अपनी और दूसरे की आत्मा की परतों को उन जवाबों के लिए : जिनके सवाल सुनने की तुममें हिम्मत नहीं : सिर्फ प्रेम हर सुख नहीं दे सकता : प्रेम में सहना पड़ता है सुखों का अभाव भी : इस प्रश्न पर भी चुप रहता है ईश्वर!

Dekalog : Ten

ये बाज़ार है : तुम्हारा हर अंग बिक सकता है कुछ कागजों के लिए : खुद को बचाने के लिए किस संदूक में बंद करोगे खुदको? : पिता कभी नहीं मरते बस जिंदा रहते कुछ आदतों के रूप में : ये जवाब है क्या ईश्वर?

धीमे बहुत धीमे, बहुत धीमे, बिल्कुल स्थिर
पृथ्वी थम जाएगी तब भी दिखेगी सुंदर,
आत्मा दिखना सबसे सुंदर पल होता है
हर बार, हाँ हर बार
यकीन करो, मैंने देखा है।


तो ये वो सब था जो मैंने Dekalog देख कर महसूस किया। और बहुत ही सरल भाषा में कहूँ तो ये सिनेमा देख कर दिमाग और आत्मा में हुए हैं विस्फोट कि बातें इस तरीके से भी कही जा सकती हैं, ऐक्टिंग इतनी सच भी हो सकती है कि लगे ये पात्र ही हैं, ये ऐक्टर नहीं हो सकते। मैंने ये अब थोड़ा बहुत world cinema देखने के बाद महसूस किया है। सोचो, इरफ़ान ने ये 1990s में देखा होगा और क्या हुआ होगा भीतर?

सीरीज कुछ बदल देगी भीतर, dialogues से ज्यादा बीच के looks और चुप्पी का इससे बेहतर इस्तेमाल मैंने आज तक नहीं देखा। और तो और इतना ग़ज़ब है सब कि फ्रेम में रखी निर्जीव चीजें भी act करती हैं। और हाँ हर एपिसोड छोड़ जाएगा कुछ सवाल जिनके जवाब… ढूँढने में सुख है। देखकर लगा कि अगर निर्मल वर्मा की कहानियों का सिनेमा बने तो वो ऐसा होगा।

तो अगर कुछ बेहद, बेहद, बेहद खूबसूरत देखना है तो Dekalog देखो। किसी platfrom पर तो available है नहीं तो जुगाड़ करो। Google के पास हर बात का जवाब है। वो ईश्वर की तरह चुप नहीं रहता। (pun intended)

तब तक देखते रहिए।

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