Gulzar - Triveni | The best among best

वैसे तो Gulzar किसी परिचय के मोहताज नहीं है। फिर भी जिन्हें नहीं जानकारी है उनके लिए बता दूं गुलज़ार फिल्मों में बतौर लेखक , गीत लेखक, पटकथा लेखक और निर्देशक के तौर पर सक्रिय रहे हैं, लेकिन इन सबके अतिरिक्त गुलज़ार एक शायर और उम्दा कवि भी हैं।

उनके बारे में और जानकारी के लिए आप यहाँ जाएं(click)।

आज हम Gulzar द्वारा लिखी गयी त्रिवेणी के संगम में से चुन के कुछ मोती लाये हैं. त्रिवेणी का मतलब ही है 3 का संगम. गुलज़ार जी इस किताब में 3 पंक्तियों की त्रिवेणी है। तीसरी पंक्ति या तो पहली दो पंक्तियों का जवाब या फिर पहली पंक्तियों पर सवाल छोड़ देती है। आप खुद ही पढ़ कर आनंद लीजिए।

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Gulzar साहब की किताब त्रिवेणी के कुछ अंश

1. आज के आर्थिक दृष्टिकोण और सामाजिक परिस्थितियों में ये त्रिवेणी बहुत ही सटीक और कड़वा सच है। जाने अनजाने हम सभी ये सच जानते नहीं या जान बूझ के अनदेखा कर रहे हैं,आप खुद ही देखिए।

कौन खायेगा? किसका हिस्सा है
दाने दाने पे नाम लिख्खा है

सेठ सूद चंद, मूल चंद, जेठा।

2. मुझे नहीं पता आप मेरी इस बात से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं पर क्या आपको नहीं लगता, हम शहरी चार दिवारी में रहने वाले लोगों का संसार बहुत छोटा होता जा रहा है। दूसरी की स्थितियों और भावनाओं को समझने में इतने असहज क्यों हो रहे हैं हम ? इस त्रिवेणी को पढ़ के आप इस सच्चाई को और क़रीब से समझ पाएं शायद।

भीगा भीगा सा क्यों है ये अख़बार
अपने हॉकर को कल से चेंज करो

"पाँच सौ गाँव बह गये इस साल!"

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3. जिन भी लोगों को ऐसा लगता है सत्ता में चाहे जो भी आये पिसना तो देश की जनता को ही है, तो साहिबान आपके अंदर जलती लौ को ये त्रिवेणी थोड़ी और हवा देगा।

परचियाँ बँट रही हैं गलियों में
अपने कातिल का इन्तख़ाब करो

वक्त यह सख़्त है चुनाव का।

4. इस त्रिवेणी में गुलज़ार ने आज के दौर के हर दूसरे इंसान के जीवन को समेट दिया है ।

साथ ही साथ चला आया है, जितना भी सफर है
रास्ते पैरों में रस्सियों की तरह लिपटे हुए हैं.

लौट के जाने से बल खुलते नहीं, और चढ़ेंगे।

5. इस त्रिवेणी के मायने मैं आपको नहीं बताऊँगा हर पाठक से चाहूँगा की वो अपना अपना खुद का अर्थ निकाले। बहुत ख़ूबसूरत त्रिवेणी है। इतना भर बताये देते हैं सहूलियत के लिए कि एक नारी की विवशता तो देखिए।

शाम से शम्मा जली देख रही है रस्ता
कोई परवाना इधर आया नहीं, देर हुई!

सौत होगी मेरी, जो पास में जलती होगी!

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6. इस त्रिवेणी में आपको एक व्यंगकार गुलज़ार की झलक दिखाई देगी जो हमारी सोच पे चोट करेगा। यकीन नहीं है तो आप खुद पढ़िये।

सांवले साहिल पे गुलमोहर का पेड़
जैसे लैला की माँग में सिंदूर।

धर्म बदला गया बेचारी का-!

7. जिंदगी की भी बड़ी अजीब कहानी है एक पल को तो ये बहुत बड़ी लगती है और दूसरे ही पल बड़ी छोटी सी मालूम पड़ती है। कभी सदियाँ सी गुज़री लगती हैं और कही बस एक पल की बात हो जैसे। आप त्रिवेणी पे गौर करें।

हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस

ये बरस तो फ़क़त दिनों में गया।

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8. भगवान हर जगह है, इस धरती एक एक कण पे उसका अधिकार है, हम सब उसे पुकारते है बुलाते है तो आइये उसमें एक खूबसूरत पुकार और शामिल करें ज़रा।


जमी भी उसकी, ज़मी की ये नियामतें उसकी
ये सब उसी का है, घर भी, ये घर के बंदे भी

ख़ुदा से कहिये, कभी वो भी अपने घर आये!

9. किताब जिनको ख़ुद से भी अजीज़ होती हैं उनके लिए एक तोहफ़ा समझ लीजिए इसे और यक़ीन मानिए अगर आपके साथ ऐसा हुआ है तो आप जुड़ जाएंगे इस त्रिवेणी से।

कुछ मेरे यार थे, रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई आया था, उन्हें ले के गया, फिर नहीं लौटे

शेल्फ से निकली किताबों की जगह खाली पड़ी है।


10. हर लोकतंत्र का बल्कि यूं कहें की सामान्य नागरिक(प्रजा) की एक बदसूरत तस्वीर है ये। बड़ी बिडम्बना है ना की हम इसके ख़िलाफ़ कुछ कर भी नहीं सकते या शायद कर सकते हैं क्या ? खैर आप शेर पढ़िये।

परचियाँ बँट रही हैं गलियों में 
अपने कातिल का इंतखाब करो

वक्त यह सख्त है चुनाव का।

वैसे तो टॉप 10 त्रिवेणी यहाँ समाप्त होते हैं पर हम जानते हैं आपका मन नहीं भरा होगा तो ये लीजये आपकी ख़िदमत में 2 और त्रिवेणी ।

11. गुलज़ार अपनी शायरी में प्रकृति को शामिल न ये बहुत मुश्किल है उनके नियमित पाठकों को ये अच्छे से पता होगा। हमने बहुत तरक़्क़ी करी है पर कुछ ऐसा भी है जो हमने खोया भी है,आप ख़ुद ही देखिए क्या खोया है।

जंगल से गुजरते थे तो कभी बस्ती भी कहीं मिल जाती थी 
अब बस्ती में कोई पेड़ नज़र आ जाये तो जी भर आता है

दीवार पे सब्ज़ा देख के अब याद आता है, पहले जंगल था।

12. बड़े अधूरे सा हूँ मैं या शायद लोग ही पूर्ण नहीं हैं या शायद लोग खुद को पूरा दिखाना ही नहीं चाहते या हो सकता है हम उनको पूरा देखना ही नहीं चाहते हैं बड़ा पेचीदा है ना ?
आप त्रिवेणी देखिए फिर तय कीजिए।

कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चटखे हुए हैं

टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझको।

13. हमारे समाज की भद्दी तस्वीर को उज़ागर करता है और हम खुद के अंदर झांकने को मजबूर करता है ये त्रिवेणी

चूड़ी के टुकड़े थे, पैर में चुभते ही खून बह निकला 
नंगे पाँव खेल रहा था, लड़का अपने आँगन में

बाप ने कल फिर दारू पी के माँ की बाँह मरोड़ी थी।

हमने अपनी समझ से इस क़िताब से कुछ मोती चुन कर गुलज़ार साहब एक का व्यापक लेखन दिखाने की कोशिश की है आपका मत हमसे भिन्न हो सकता है और हम उसकी प्रशंसा करते हैं लेकिनआप सबसे हाथ जोड़कर निवेदन है इस क़िताब को ढूंढ के पढ़ें। तो ये थे त्रिवेणी सागर से चुने हुए मोती।

अगर आपको पसन्द आए हों और पढ़ने की इच्छा हो तो यहाँ से किताब पढ़ सकते हैं –

त्रिवेणी – गुलज़ार 

अच्छी लगीं हो तो बताईए, ना लगी हो तो बताईए। तब तक पढ़ते रहिए। 

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