Nirmal Verma - मेरी प्रिय कहानियाँ | निर्मल वर्मा

अभी हाल ही में Nirmal Verma जी की किताब मेरी प्रिय कहानियाँ पूरी की है। इसमें उनकी पसंद की कहानियाँ हैं जो उन्होंने अपने लिखने के बरसों में लिखी थी। इसमे परिंदे भी है और दूसरी कहानियाँ भी। 

निर्मल वर्मा (Nirmal Verma) के बारे में दो बार हम पहले भी बात कर चुके हैं और हर बार कुछ नया लेकर आते हैं। इस बार उनकी तारीफ ना करके मैं खुद ही उनको आपके सामने प्रस्तुत कर दूंगा। उनकी इस किताब से कुछ अंश यहाँ दे रहा हूँ। 

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निर्मल वर्मा की किताब – मेरी प्रिय कहानियाँ | अंश

जो अन्तर है-उसे समझ नहीं सकता, उस पर उंगली नहीं रख पाता...वह कैसा भाव था जो किसी लम्बी दूरी को हमारे पास ले आता है, लेकिन अपने को दूर ही रहने देता है।

कुछ सहमे हुए शब्द सुनाई देते थे-कभी दूर से-इतनी दूर से कि शब्दों के बजाय आहट ही मुझ तक पहुँच पाती थी, कभी पास से, इतने पास से, इतने पास से मानो कोई मेरे कानों में फुतफुला रहा हो।

"एक सफेद छाया है बानो-जैसे बर्फ से लिपटी हो। वह अँधेरे में भी चमकती है और संगमरमर-से सफेद उसके हाथ हैं, जो हमेशा हवा में खुले रहते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि पीछे से चुपचाप आकर उसने मुझे अपने में ओढ़ लिया है और मैं अपने से ही अलग हो गया हूँ-सच बानो-लगता है जैसे में अपने से ही अलग हो गया हूँ..."

हूँ...आदमी बात कर सकता है और चुप रह सकता है, एक ही वक्त में। इसे बहुत कम लोग समझते हैं।

हर आदमी को अपनी ज़िन्दगी और अपनी शराब चुनने की आज़ादी होनी चाहिए...दोनों को सिर्फ एक बार चुना जा सकता है। बाद में हम सिर्फ उसे दुहराते रहते हैं, जो एक बार पी चुके हैं, या एक बार जी चुके हैं।

मैं ऐसे लोगों की कल्पना नहीं कर सकता जिनका इन्तज़ार कोई नहीं कर रहा हो या जो खुद किसी का इन्तज़ार नहीं कर रहे हो। जिस क्षण आप इन्तजार करना छोड़ देते हैं, उस क्षण आप जीना भी छोड़ देते हैं
समय बहुत-कुछ सोख लेता है...क्या आप भी ऐसा सोचते हैं? मुझे मालूम नहीं...लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि वह सोखता उतना नहीं, जितना बिहार देता है-अंधेरे कोनों में, या कालीन के नीचे, ताकि बाहर से किसी को दिखाई न दे। लेकिन उसके पंजे हमेशा बाहर रहते हैं, किसी भी अजानी घड़ी में वे आपको दबोच सकते हैं। शायद में भटक रहा

डॉक्टर, सब कुछ होने के बावजूद वह क्या चीज है, जो हमें चलाए चलती है, हम रुकते हैं तो भी अपने बहाव में वह हमें घसीट लिए जाती है?" लतिका से आगे कुछ नहीं कहा गया, जैसे जो वह कहना चाह रही है, वह कह नहीं पा रही, जैसे अँधेरे में कुछ खो गया है, जो मिल नहीं पा रहा, शायद कभी नहीं मिल पाएगा।
"कभी-कभी मैं सोचता हैं, मिस लतिका, किसी चीज़ को न जानना गलत है, तो जान-बूझकर न भूल पाना, हमेशा जोंक की तरह चिपटे रहना. यह भी गलत है। 

अगर आपको अच्छा लगे तो यहाँ से पढ़ सकते हैं। 

मेरी प्रिय कहानियाँ 

अच्छी लगें तो बताईए, बुरी लगें तो भी। बाकी पढ़ते रहिए। 

Also : मैं और कृष्ण | यथार्थ लिखने पर बातचीत

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