Books कहानी

आधे- अधूरे | मोहन राकेश | नाटक | आधे- अधूरे… हम सब की तरह |

एक घर, उसमें रहने वाले कुछ लोग और उनकी ज़िंदगी के इर्द गिर्द घूमते संवाद। संक्षेप में तो यह नाटक यही है। परंतु क्या सच में यह नाटक भी इस पंक्ति के जितना ही सतही है? या कुछ और भी है इस नाटक में जो थोड़ा गहरा है, जिसे इन कुछ शब्दों से नहीं समझाया जा सकता है।