आधे- अधूरे | मोहन राकेश | नाटक | आधे-  अधूरे… हम सब की तरह |

आधे- अधूरे | मोहन राकेश | नाटक | आधे- अधूरे… हम सब की तरह |

एक घर, उसमें रहने वाले कुछ लोग और उनकी ज़िंदगी के इर्द गिर्द घूमते संवाद। संक्षेप में तो यह नाटक यही है। परंतु क्या सच में यह नाटक भी इस पंक्ति के जितना ही सतही है? या कुछ और भी है इस नाटक में जो थोड़ा गहरा है, जिसे इन कुछ शब्दों से नहीं समझाया जा सकता है।

आगरा बाज़ार – हबीब तनवीर साहब की Time Travelling Machine

आगरा बाज़ार – हबीब तनवीर साहब की Time Travelling Machine

अदना, गरीब, मुफलिस, जरदार पैरते हैं,
इस आगरे में क्‍या-क्‍या, ऐ यार, पैरते हैं।
जाते हैं उनमें कितने पानी में साफ सोते,
कितनों के हाथ पिंजरे, कितनों के सर पे तोते।
कितने पतंग उड़ाते, कितने मोती पिरोते,
हुक्‍के का दम लगाते, हँस-हँस के शाद होते।
सौ-सौ तरह का कर कर बिस्‍तार पैरते हैं,
इस आगरे में क्‍या-क्‍या, ये यार, पैरते हैं॥

Chekhov’s The Seagull – Some lines

Chekhov के नाटक The Seagull पढ़ते हुए ये कुछ पंक्तियाँ पसंद आईं हैं –   अच्छे साहित्य में सवाल नए या पुराने तरीकों या रूपों का नहीं है, बल्कि विचारों का है जो लेखक के हृदय से स्वतंत्रता से निकले हों, बगैर उसके सोचे कि उनका रूप क्या होगा। – चेखव – नाटक  – द…

A Soldier’s Play – नाटक  समीक्षा | Play Review

A Soldier’s Play – नाटक समीक्षा | Play Review

कोई नाटक किसी समय की सोच और उस से जुड़े सवाल इतने पारदर्शी और सुंदर ढंग से कह सकता है, मैंने सोचा नहीं था। इसको पढ़ने के बाद अच्छे से समझ में आता है कि क्यूँ Charles Fuller को इस नाटक के लिए Pulitzer Prize मिला होगा।

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