Books review | समीक्षा कहानी हिन्दी

हरिशंकर परसाई जी की किताब “ प्रेमचन्द के फटे जूते ” से कुछ अंश ( पार्ट-1 )

दानवों के सहयोग के बिना वे लक्ष्मी प्राप्त ही नहीं कर सके। तो अपनी अर्थव्यवस्था का जो समुद्र है उसके मंथन के लिए में दानवों से समझौता करूं, तब लक्ष्मी बाहर निकलेगी। फिर भी क्या ठिकाना कि वह मुझे मिल ही जाएगी। मामूली देवता तो असंख्य थे, पर लक्ष्मी उन्हें कहाँ मिली? वह सीधे विष्णु के पास गयी और गले लग गयी। दुसरे देवताओं ने भी कोई प्रोटेस्ट नहीं किया। करते भी कैसे? विष्णु बहुत बड़े थे-शक्ति में, धन में, रूप में और चातुर्य में। स्त्री बनकर जिसने अपने दोस्त शंकर को ठग लिया, उसकी चतुराई की कोई कमी नहीं थी। लक्ष्मी सीधी ‘मोनोपली में जाकर मिल गयी।

review | समीक्षा फिल्म

Eeb Allay Ooo! | The Perfect Cinema by Director Prateek Vats

एक सीन में republic day यानि 26 जनवरी की परेड चल रही है। बहुत से बंदर भगाने वाले आस पास हैं जिससे बंदर ना आ जाएँ। और फिर सामने से बंदरों की ही झांकी निकलती है और सब ताली बजाते हैं। ये अपने आप में बहुत ironic है। अंजनी की नजरों से देखने पर हँसी आती है। लेकिन तुरंत कुछ खयाल भी आते हैं।

नौकरी देने से पहले documentary दिखाई जाती है बंदरों पर जिसमे कहा जाता है कि – पहले इंसानों ने इन्हे भगवान का दर्जा दिया। खाने को प्रसाद और दूसरी चीजें दीं। तो इनका हौसला बढ़ गया। इन्हे लगता है कि इन्हे खाना खाने के लिए खाना ढूँढने की जरूरत नहीं है।

Books कहानी हिन्दी

नौकर की कमीज – विनोद कुमार शुक्ल | अंश

संघर्ष का दायरा बहुत छोटा था। प्रहार दूर-दूर से और धीरे-धीरे होते थे इसलिए चोट बहुत जोर की नहीं लगती थी। शोषण इतने मामूली तरीके से असर डालता था कि विद्रोह करने की किसी की इच्छा ही नहीं होती थी। या विद्रोह भी बहुत मामूली किस्म का होता। यदि सब्जी बहुत महंगी मिलती थी तो इसका कारण उन सब्जी बेचनेवालों को समझता जो टोकरी में सब्जी बेचने मुहल्ले-मुहल्ले घूमते थे। उनसे सब्जी तौलाते समय डपटकर बोलता – तौल ठीक होना चाहिए। सड़ी आलू मत डाल देना। तुम लोग ठगते हो, डंडी मारते हो, लूटते हो। यही मेरा विद्रोह था।