मैं और कृष्ण | यथार्थ लिखने पर बातचीत

मैं और कृष्ण | यथार्थ लिखने पर बातचीत

निर्मल वर्मा ने कहा है – “जब हम कहानी में लिखते हैं, वह सितंबर की एक शाम थी – मैं उस सूनी सड़क पर चला जा रहा था, तब इस पंक्ति के लिखे जाने के एकदम बाद कुछ ऐसा हो गया है, जो शाम से बाहर है, उस सूनी सड़क से अलग है। वह ‘मैं’ उस व्यक्ति से अलग हो गया है, जो उस शाम सड़क पर चल रहा था। उस वाक्य का अपना एक अलग एकांत है, जो उस शाम की सूनी सड़क से अलग है। शब्दों ने उस शाम को मूर्त करने की प्रक्रिया में अपनी एक अलग मूर्ति गढ़ ली है, जिसकी नियति उस व्यक्ति की नियति से भिन्न है, जो ‘मैं’ हूँ।”

संवेदनाओं के व्यापार में संवेदनाएं | विचार

संवेदनाओं के व्यापार में संवेदनाएं | विचार

अभी दो दिन पहले मैंने नीलेश मिश्रा जी द्वारा संचालित डॉ कुमार विश्वास का Slow interview देखा तो उसमें सबसे ख़ूबसूरत एक पंक्ति सुनी “ संवेदनाओं के व्यापार में संवेदनाएं धीरे धीरे कारोबार बन जाती हैं ” ।

मझे बहुत ही ख़ूबसूरत और एक दम सत्य लगी ये लाइन कि हम लोग जाने-अनजाने अपनी भावनाएं और अपनी अनुभूति को बेचने लगे हैं। हर व्यक्ति एक न एक स्तर पर ये कर रहा है – चाहे फिर वो क्रिएटिव लोग हों या हम जैसे सामान्य आदमी। कुछ हद तक ये ठीक भी है पर उसका दायरा कितना हो, ये तो तय करना होगा ना!

Chekhov’s The Seagull – Some lines

Chekhov के नाटक The Seagull पढ़ते हुए ये कुछ पंक्तियाँ पसंद आईं हैं –   अच्छे साहित्य में सवाल नए या पुराने तरीकों या रूपों का नहीं है, बल्कि विचारों का है जो लेखक के हृदय से स्वतंत्रता से निकले हों, बगैर उसके सोचे कि उनका रूप क्या होगा। – चेखव – नाटक  – द…

A Soldier’s Play – नाटक  समीक्षा | Play Review

A Soldier’s Play – नाटक समीक्षा | Play Review

कोई नाटक किसी समय की सोच और उस से जुड़े सवाल इतने पारदर्शी और सुंदर ढंग से कह सकता है, मैंने सोचा नहीं था। इसको पढ़ने के बाद अच्छे से समझ में आता है कि क्यूँ Charles Fuller को इस नाटक के लिए Pulitzer Prize मिला होगा।

नाटक में जीवन कैसा होना चाहिए?

नाटक में जीवन कैसा होना चाहिए?

जीवित पात्र! नाटक में जीवन जैसा है वैसा नहीं बल्कि ‘जैसा होना चाहिए’ वैसा दिखाना होता है; सपनों वाला जीवन।