Cheepatakadumpa : फटी आँखें और एक खेल | Devashish Makhija

आओ मीना, सुपा सीना.. का खेल। खेल ही तो है। फ़िर चारों तरफ़ इतनी चौंकी हुई आँखें क्यूँ? यह निगरानी क्यूँ? क्या है खेल में ऐसा? क्या खेल कोई घेरा है? जो तुमने खींचा है? कि रहे वो इसी लकीर के भीतर? क्या करेंगी यह आँखें जब खेलने वालियों ने खेल के नियम बदलने शुरू कर दिये? आओ मीना, सुपा सीना.. तालियों और हँसी की खिलखिलाहट में ऐसे कहा बचपन की तीन सहेलियों ने एक दिन कि खेल उनका हो गया, साथ में नियम भी और लकीरें.. उनका क्या? वो बन गयी उनके अल्हड़ मुक्त बालों की लट।

Cheepatakadumpa Poster 2021. Copyright Makhijafilm
Cheepatakadumpa Poster. Copyright Makhijafilm 2021

लगभग तेईस मिनट की एक शॉर्ट फिल्म है Cheepatakadumpa नाम से देवाशीष मखीजा की। ये देवाशीष मखीजा वहीं हैं जिन्होंने भोंसले बनाई है। तो, Cheepatakadumpa तीन दोस्तों की कहानी है जो बहुत दिनों बाद मिलते हैं।फ़िल्म का पहला शॉट आता है और एक लड़की की आहें सुनाई देती हैं। फिर हँसी। दोस्तों का मिलना। और मस्ती। और बातें। फिर बातों बातों में बात orgasms पर पहुँचती है। और कहानी यहाँ से एक उम्दा ब्लैक कॉमेडी की शक्ल में तब्दील होकर उभरती है।

मैं इसे देखते हुए गला फाड़ के हँसी। इस फ़िल्म की ब्रिलियंस सबसे पहले इसके हास्य में है। मेरे लिए तो कम से कम। हास्य वो जो जबरदस्ती थोपा ना गया हो। बल्कि वो जो पात्रों के बीच की चुलबुली नोक झोंक से और भाषा के रस से निकलता हो खुद ब खुद। इतना ऑर्गेनिक और सहज बुलबुले जैसा फूटता हास्य अपने क्राफ्ट में इस सफलता से लाना देवाशीष मखीजा की एक निर्देशक के तौर पे सबसे बड़ी उपलब्धि है मेरी नज़र में।

फ़िल्म की दूसरी ब्रिलियंस इसके visual metaphors में है। तरह तरह के बुत और उनकी आँखें। हर तरफ़। बस आँखें। मानों आँखें नहीं सदियों पुरानी बेड़ियाँ हों। जो घूरकर खेल में सबकी सीमाएँ तय करती हैं। जो पितृसत्ता की रखवालिन हैं। यह आँखें कितनी चालक हैं! कभी प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने होती हैं तो कभी दूर बैठे बैठे खींचती हैं एक लड़की के पैर पे बंधी बेड़ी अपनी ताकत आज़माने के लिए।

जब जब बेड़ियाँ छनकती हैं.. एक लड़की दूर काँपती है। उसकी एक दोस्त है जो कहती है आज रात मुक्ति पाई जा सकती है। पर क्या इतना आसान है मुक्ति पाना? बेड़ियों की जकड़ सदियों पुरानी हैं और उनके भार के साथ चलने की आदत भी। यह स्तिथि इतनी एब्सर्ड है कि शरीर को एक दौरा पड़ता है और कोई अटक जाता है। दो नावों के बीच लटका हुआ सा। तब कोई नए ज़माने की दवा नहीं बल्कि किसी पुरानी हकीम की छुअन ही काम आती है। कहते हैं की छुअन बहुत गहरे उतरती है शरीर में। इन्हीं गहरे उतरने वाले हाथों ने सदियों पहले काँटा फँसाने में साथ दिया होगा कभी, तो अब निकालेंगे भी यही। मुक्ति की रात है। बेड़ी बाँधने वालियों को भी मुक्ति मिलेगी और खेल खेलने वालियों को भी।

इस फ़िल्म को देखना। ज़रूर देखना। और इसे अपने जीवन में आई सभी स्त्रीयों को भी दिखाना। इसे देखने के बाद उनका खुद के शरीर से रिश्ता थोड़ा और बेहतर हो जाएगा। इस फ़िल्म कि यही सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह फिल्मों और बाज़ार द्वारा बनाई गई सुंदरता की परिभाषा को बिल्कुल उलट देती है। इसमें सारे एक्टर्स बिल्कुल हम आम इंसानों जैसे दिखते हैं। इनके चेहरों पर बहुत सी फुंसियाँ हैं। इनके शरीर थोड़े बेडौल से हैं। इनके बाल झल्ले हैं। और इनके चेहरों पर खूबसूरत चमक है। जीवन की चमक। जो काँच जैसी चमकती गोरी त्वचा का दिखावा आँखों से हटा देती है। ठीक यही बात फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी में भी देखने को मिलेगी। इतने वाइब्रेंट कलर्स! और इतना नजदीक फोकस। जैसे जीवन का मेला लगा हो कोई। और आप बहुत पास से सब देख रहे हो। बहुत सुंदर। देखना इस फ़िल्म को।

कहाँ देखें?

तो अभी एक online international film festival चल रहा है – Dharamshala International Film Festival. उसमें ये stream हो रही है। 14 November तक वहाँ चलेगी। आप तुरंत जाकर देख सकते हैं।

Film Festival की जानकारी इस link से लीजिये – Cheepatakadumpa – DIFF 202

Trailer देखना है तो यहाँ जाइए – Cheepatakadumpa – Trailer

Film और Team के बारे में और जानना है तो फिर यहाँ click करिए – Cheepatakadumpa – Website

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Article Written ByHarshita Pandey & Arun Kumar Singh

Stills of Cheepatakadumpa | Courtesy: Makhijafilm 2021.

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