Tarkovsky & His Cinema's Hope | A Conversation

Andrei Tarkovsky एक रूसी फिल्मकार हैं। इन्हें दुनिया के महानतम फिल्मकारों की श्रेणी में गिना जाता है। बीते दिनों इनकी फिल्म Solaris, The Steamroller & The Violin, Andrei Rublev, Mirror, Stalker और The Sacrifice देखी। बल्कि यूँ कहें कि बार बार देखी। उनसे जो कुछ महसूस हुआ है उस पर यह संवाद है।

इन संवादों में परिधि पर जीते दो लोग अपने आस -पास को समझने की कोशिश कर रहे हैं। सारे अर्थ, सारे metaphor, सारे relations निजी और सीमित समझ के अनुसार हैं। और समय के साथ बदल सकते हैं। वो क्या है ना – झूठ और सच के पत्थर बहुत पहले एक अंधे आदमी ने बदल दिए थे। हम तो बस वो कहानी जी रहे हैं।

 

– सुनो!!!

– कहो..

– आत्मा में भयंकर विस्फ़ोट हो रहे! यह दुनिया कितनी सुंदर है इस वक़्त!!

– Tarkovsky की सारी फ़िल्में देख ली ना तुमने?

– हाँ!

– अच्छा.. अगर एक शब्द में सब समेटने को कहूँ तो क्या कहोगे? वो एक बिंदु जिस पर तुम हाथ रख के कह सको की हाँ यह छूना चाह रहे थे वो अपनी फिल्मों में।

– आशा! आशा! हर बार आशा!

– चलो फ़िर आगे सुनाओ.. आशा की कहानियाँ हैं, सुंदर होंगी।

Sacrifice | Tarkvosky

– तो, Tarkovsky के बारे में पहली बात – जैसा की मैंने अभी कहा उनकी हर मूवी आशा के बारे में है। Hope against all odds. Stalker मूवी में जो मुख्य पात्र है वो एक पूरा मोनोलॉग बोलता है – विश्वास और आशा के बारे में – और क्यूँ विश्वास करना इतना ज़रूरी है। और खासकर इस परिस्थिति में क्यूँकि Stalker मूवी में पूरी दुनिया युद्ध से ग्रसित है। औद्योगीकरण के दुष्परिणाम दिख रहे हैं। पर zone नामक एक जगह है जहाँ लोग जाने से डरते हैं। क्यूँकि वो रहस्यमयी है, प्राकृतिक है और वो तुम्हारे भीतर की सबसे गहरी इच्छा पूरी करती है। लेकिन उससे पहले तुम्हें बहुत सी पहेलियों और तिलिस्मों से गुज़रना होगा। Stalker वो आदमी है जो तुम्हारी मदद कर सकता है क्यूँकि वो उस nature को समझता है और वो अपना जीवन यानी कि अपनी बेटी और बीवी तक को इसके लिए त्यागने को तैयार है। वो सबको दिखाना चाहता है कि विश्वास और आशा वहीं हैं; उनकी पहुँच के अंदर। हमारे सपने पूरे हो सकते हैं.. हमें बस थोड़ी आशा और थोड़े विश्वास की ज़रूरत है। और जब दूसरे उसके विश्वास पर सवाल करते हैं- तब वो सीधे पूछता है कि क्यूँ, आखिर आशा को क्यूँ खत्म करना है?

Stalker | Tarkovsky

है ना सुंदर?!

– बहुत!! मतलब अब मुझे भी यह देखने का मन कर रहा है!

– अभी आगे सुनो.. तुम्हें प्रेम हो जाएगा Tarkovsky के सिनेमा से।

उनकी दूसरी मूवी Sacrifice नसीब और भाग्य के बारे में है। अगर तुम अपने आस पास के लोगों..अपने करीबी लोगों का वर्तमान और भविष्य बचा सकते हो लेकिन इसके लिए तुम्हें अपनी सबसे कीमती चीज़ sacrifice करनी होगी, तो क्या तुम करोगे? तब तुम किस पर विश्वास करोगे – आशा में ना! आशा इस बात की, कि एक दिन चीजें बेहतर होंगी क्यूँकि – मशीनीकरण और औद्योगिक तरक्की से त्रस्त एक दुनिया जहाँ कोई आशा में विश्वास नहीं करता, ना प्रकृति और आध्यात्मिकता पर या फ़िर यूँ कह लो कि कोई भी ऐसी चीज़ जो हमारे मनुष्य होने से परे है.. हमसे बढ़कर है (Transcendental) – तो वहाँ आशा के अलावा बचा ही क्या है किसी के हाथ में?

Sacrifice | Tarkvosky

उसी तरह Steamroller and The Violin मूवी में भी – सारा कुछ अगर छोड़ दें तो दिखता है कि – हर कोई किसी ऐसी चीज़ में विश्वास कर रहा है जिसे छुआ नहीं जा सकता लेकिन वो भरोसा करते हैं। यह अपने से परे किसी चीज़ से प्राथना जैसा है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ सब कुछ खुरदुरा और ठोस होते जा रहा है मशीनीकरण की वजह से – कुछ बेहद कोमल वहाँ अभी भी बचा है। और जो सब को छू रहा है जैसे violin, संगीत, उस बच्चे का दूसरे बच्चे के प्रति प्रेम जो किसी और से पिट रहा था, उस स्टीमरोलर वाले आदमी और औरत के बीच प्रेम, ईमानदारी, सुंदरता, सपने..!

 

और Tarkovsky मुझे ऐसा लगता है हमसे बस विश्वास करने को कह रहे हैं आशा में.. सपने देखने में – कि एक दिन – steamroller और violin एक संतुलन में पहुँचेंगे और सब सुंदर हो जाएगा। जैसा हमें उस बच्चे और आदमी के साथ महसूस होता है। एक तालमेल।

The Steamroller and The Violin – Tarkovsky’s Visual Music

– यार, Steamroller and The Violin को देखना तो अपने आप में एक अलग ही अनुभव है! लगता मानो किसी ने इस दुनिया की सारी मासूमियत और आशा इकट्ठी करके उस फ़िल्म में रख दी हो।

– अरे वही तो! कला – यह इसीलिए तो है कि हम अपने से परे कुछ अनुभव कर सके। मासूमीयत और आशा – यह महसूस करने वाली चीज़ें हैं। तुम कविता क्या है के जवाब में किसी को कैसे बताओगे कि कविता क्या है? मीठा कैसा होता है? इसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। और अगर कला की मदद से अपने से परे किसी चीज़ को छुआ जा सकता है तो क्या Tarkovsky हमसे सीधे सीधे कला पर विश्वास करने को नहीं कह रहे? कि हमसे परे है कुछ जिसे समझाया नहीं किया जा सकता पर महसूस किया जा सकता है।

Feel it in your bones, get touched by it, changed by it, mesmerized by it… you just have to believe that it’s possible.

और हम, हम जो किताबों और फिल्मों के पीछे पागल हैं – हर लेखक, फ़िल्मकार, पेंटर या कलाकार यही बात नहीं कह रहा कि फ़िक्शन सच में बहुत सुंदर है और इससे बहुत खुशी मिलती है – हमें बस विश्वास करने की ज़रूरत है। याद है विनोद कुमार शुक्ल की बात – यथार्थ तो झूठ है, कल्पना है जो असल में सच है। क्या हम सब अपने जीवन के Stalker नहीं है जिन्हें Zone (फ़िक्शन) का रास्ता पता है और जिससे जो हम चाह रहे हैं वो मिल सकता है!!

Stalker | Tarkovsky

 

और जब इस पर कोई सवाल करता है – क्या हम लड़ने के लिए तैयार नहीं हो जाते और बदले में बस इतना माँगते हैं कि सामने वाला थोड़ा सा विश्वास करे इस पर।

Andrei Rublev | Tarkovsky

– हाँ! कितना चुभता है ना भीतर की तुम्हें जहाँ दुनिया की सारी आशा और जादू दिखता है वहाँ दूसरे लोग जाने से डरते हैं या कतराते हैं। लोग समझ ही नहीं पाते कि हम क्यूँ कला से इतना प्रेम करते हैं। ठीक जैसे Stalker के लिए zone ही उसकी खुशी, उसकी दुनिया, उसकी असली आज़ादी बन जाता है और बाकी हर जगह उसे एक कैदी जैसा लगता है – वैसा ही कुछ हमारे साथ नहीं होता?

– हाँ! बिल्कुल!

और वो बात याद है जो Writer का पात्र कहता है Stalker मूवी में कि – हमें नहीं पता हमारे भीतर की असली इच्छा क्या है। हमें लगता है हमें पता है, पर असल में ऐसा कितनी बार सच होता है? और जब हमें वो मिलता है जो हमें लगता था कि हम चाहते हैं तो हम अचंभे में पड़ जाते हैं कि ये क्या है।

Stalker | Tarkovsky

इससे निर्मल वर्मा की वो बात याद नहीं आती की – साहित्य प्यास नहीं बुझाता, वो बस प्यास को उजागर करता है।

You want knowledge to understand that there is nothing to know. Your deepest desire to know nothing. To reach that point where nothing is needed to know or understand.

– और शायद इसीलिए Writer zone में नहीं जाता है क्यूँकि वो डरता है अपनी सबसे गहरी इच्छा को जानने से या उसके सच होने से। उसे यह नहीं पता कि वो क्यूँ आया है लेकिन अब डर यह है कि वो जानना भी नहीं चाहता क्यूँकि शायद जो सच है वो उसे और ज़्यादा miserable ना बना दे।

Stalker | Tarkovsky

– अरे, यह डर वही Porcupine(एक पात्र) की कहानी की तरह है कि वो आदमी अपने भाई को zone में ले गया और वहाँ किसी वजह से उसका भाई मर गया पर Porcupine को पैसे मिल गए। लेकिन सप्ताह भर बाद उसने आत्महत्या कर ली। क्यूँ? क्यूँकि उसे पता था कि वो चाहकर भी अपने भाई को ज़िंदा नहीं कर सकता। Zone की मदद से भी नहीं क्यूँकि Zone हमेशा आपकी सबसे गहरी इच्छा ही पूरी करता है और zone ने उसे पैसे दिए थे। यानी उसकी असल इच्छा वही है यह उसे मालूम पड़ गया था। और अब उसके भीतर का guilt की असल में वो अपने भाई से ज़्यादा पैसों से प्यार करता था – उस guilt ने उसे मार दिया।

– और ठीक ऐसे ही Solaris मूवी में भी तो Solaris गृह का पानी तुम्हारे भीतर की इच्छा को पूरा करता है। क्या ये Zone की तरह नहीं है?

Solaris | Tarkovsky

– अबे हाँ! Solaris में मुख्य पात्र Kris असल में अपनी मरी हुई बीवी से प्रेम करना चाहता था। वो प्रेम जो वो पहले नहीं कर पाया। उसकी वो इच्छा जो उसे खुद भी नहीं पता थी, वो Solaris गृह ने पूरी कर दी.. उसकी बीवी जिंदा हो गई और दोनों को फिर से प्रेम हो गया।

यानी Tarkovsky हर बार एक ही बात कह रहे। बस कहने का तरीका सुधर रहा है।

और यही जादू है ना? कि हर कहानी की असल बात एक ही धुरी पर चल रही है और हर कहानी या फिल्म के साथ Tarkovsky खुद के लिए चीजें साफ़ कर रहे हैं कि असल में वो क्या कहना चाहते हैं। कितना सरल है ना! एक व्यक्ति जो समझता है कि कला अपने आप को जीने के लिए है। अपने आप को समझने के लिए। सोचो, क्या अपने भीतर जाने के रास्ते में बहुत सी पहेलियाँ नहीं सुलझानी पड़ती? और हमें पता है जैसे ही हम अपने भीतर को समझ लेंगे, हमें सुकून मिल जाएगा लेकिन तब पता चलेगा, जानने के लिए आगे कुछ है ही नहीं। क्या zone हमारे भीतर का एक प्रतीक नहीं हुआ?

Stalker | Tarkovsky

Stalker मूवी को इस नज़रिए से देखें कि – अगर तुम्हारी आध्यात्मिकता यानी Spirituality ही Stalker है, Professor तुम्हारा सीखा हुआ..अर्जित किया ज्ञान है और Writer वो कहानी है जो तुमने खुद को दुनिया के बारे में सुनाई है – तो यह तीनों ही अलग अलग किरदार तुम्हारे भीतर के अलग पहलू हैं बस। 

तुम्हारी आध्यात्मिकता(यानी stalker) कहती है कि तुम्हें अपनी इंस्टिंक्टस पर भरोसा करके अपने भीतर को टटोलना चाहिए लेकिन Professor यानी तुम्हारा सीखा हुआ ज्ञान कहता है कि मुझे भी लेके चलो साथ(फ़िल्म में professor का पात्र अपना बैग नहीं छोड़ता) और तुम्हारा Writer हमेशा अपने बीते हुए कल के बारे में सोचता रहता है यानी वो कहानी जो तुमने अपने आप को इस दुनिया के बारे में बताई है और तुम बार बार उसे ही याद करते हो ताकि तुम्हारे भीतर वही गुस्सा बने रहे दुनिया को लेके। इन सब की वजह से तुम अपने भीतर में यानी ज़ोन में और उलझ जाते हो.. चीज़ें और जटिल हो जाती हैं और तुम कभी कभी जाल(traps) में फँस जाते हो जैसे वो लोग फँस जाते हैं। तब तुम्हें किसकी ज़रूरत होती है? विश्वास की.. आशा की।

Stalker | Tarkovsky

– और इसीलिए तो हमें कला की ज़रूरत है..अपने भीतर की इन पहेलियों को सुलझाने के लिए। कला इसमें हमारी मदद करती है। तुम्हारी वो बात कितनी सही है की Tarkovsky भी तो यही करते हुए जान पड़ते अपनी फ़िल्मों के ज़रिए। अपने भीतर को समझने की कोशिश। जिस तरह से वो दुनिया देखते हैं.. उनकी सब्जेक्टिव नज़र.. उसे अपने किए में उतारने की कोशिश। और जैसा की तुमने कहा वो हर बार बात एक ही कह रहे बस कहने का तरीका और सुधर रहा हर फ़िल्म के साथ। क्या हर कलाकार यही नहीं करता? मानव कौल, विनोद कुमार शुक्ल, क्रिस्टोफ़र नोलन, काफ़्का, आनंद गाँधी, बैकेट, निर्मल वर्मा.. सब लोग(हम भी) यही तो करते रहे जीवन भर!

– ओह भाई, भयंकर विस्फ़ोट!!!! इतनी सरल बात की कला हमें इस दुनिया को सब्जेक्टिवली महसूस करने को कहती है। Tarkovsky की सब फ़िल्मों में यही तो है कि सब कुछ महसूस करो – उस Steamroller वाले आदमी का दर्द, Stalker की झुँझलाहट जब आशा पर कोई विश्वास नहीं करता, Sacrifice मूवी में मुख्य पात्र की आशा, Kris के पात्र का द्वंद अपनी मरी हुई बीवी को पा लेने में यह जानते हुए की वो solaris ने उसे दी है। यह बातें तुम्हें प्रत्यक्ष तौर पर नहीं दिखाई देतीं लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे महसूस होती हैं क्यूँकि हर फ़िल्म बनाई ही कुछ इस तरह गयी है.. एक एक फ्रेम अपने आप में बहुत कुछ कहता है.. हर कैमरा मूवमेंट का एक मतलब है पात्रों के नज़रिए से देखने पर.. और यही तो Tarkovsky जैसे सुंदर-प्यारे-दिमाग के परखच्चे उड़ाने वाले-आत्मा में दनादन विस्फ़ोट करने वाले इंसान का जादू है! उफ़्फ़!!!

– ये कितना सुंदर है ना? तुम अभी खुद को देख रहे हो? इतनी आशा से भरे हुए! क्या ये Tarkovsky की एक कलाकार के तौर पे सफ़लता नहीं है कि उनकी कला ने ये सब चीजें तुम्हारी subconscious में उजागर करी हैं? क्या यही कला का उद्देश्य नहीं है? क्या तुम देख पा रहे हो.. इस ऊर्जा.. इस प्रेम.. इस आशा.. और इन सबसे ऊपर आशा में इस विश्वास को??

– हाँ! हाँ! हज़ार बार हाँ! यह है ही इतना सुंदर आदमी!

– और वो बात कितनी सही कही थी तुमने अभी कि यह सब अन्तर्प्रवाह में चलता है। जैसे ऊपरी कहानी तो बस एक मुखौटा है और कोई उसके पीछे से आवाज़ दे रहा हो.. बात कर रहा हो तुमसे। वो बातें जो शायद शब्द पाते हीं अपना अर्थ खो देंगी लेकिन वो ज़िंदा रहती हैं.. फ़िल्म खतम हो जाने के बहुत देर बाद तक भी तुम्हारे भीतर।

– अरे इसीलिए तो, इन्हीं बातों को कहने के लिए ही surrealistic visuals, indefinitive meanings और images का इस्तेमाल है फिल्मों में..

 

– जिससे इतने सुंदर दृश्य बनते हैं जो किसी दूसरी ही दुनिया के लगते हैं।

– और जितना सोचो उनके अर्थ उतने बढ़ते जाते हैं।

क्या ये हमारी बेवकूफी नहीं है कि उन्होंने उनकी फिल्म समझने की चाबी हमारे सामने रख दी है लेकिन हम अर्थ ढूँढने में इतने पागल हैं कि हमें वो दिखती ही नहीं?

जिस पल हम बँधे बँधाए शब्दों से मतलब जोड़ने की कोशिश करते हैं – मतलब हाथ से छूट जाता है। जो बचता है वो बस एक अनुभूति.. एक एहसास होता है जो साथ रह जाता है.. जिसे कहा नहीं जा सकता।

 

– और क्या तुमने यह बात गौर करी की क्यूँ उनकी फिल्मों में आशा का होना इतना ज़रूरी था? क्यूँकि वो खुद को आशा दे रहे थे असल में। अपने आस पास के लोगों को। वो समय ही ऐसा था ना। उस समय के रूस में वहाँ रहने वाले लोगों की क्या मानसिक हालत रही होगी। उस वक़्त सबसे ज़्यादा क्या उन्हें विश्वास और आशा की ही ज़रूरत नहीं रही होगी? और Tarkovsky की हर फ़िल्म ज़्यादातर एक फंतासी की भेस भूषा में ढली होती है। रूसी सेंसर से बचने की कोशिश में शायद और इसलिए भी की वो सारी फंतासी वाली दुनियाएँ उनकी असल दुनिया के लिए कितने सही रूपक का काम करती हैं। और ऐसे बैकड्रॉप में क्या वो अपने पात्रों के ज़रिए यह नहीं दिखा रहे कि वहाँ के साधारण रूसी व्यक्ति की क्या इच्छाएँ.. क्या मानसिक अवस्था रही होगी उस समय? क्या Stalker में जब मुख्य पात्र कहता है कि बाहर उन्होंने मुझसे सब छीन लिया और zone यानी आशा ही अब मेरी ज़िंदगी है तो यह बात बहुत गहरे नहीं लगती मन में?

– अरे यार, यह बात! अब तो और भी अच्छे से सब जुड़ रहा दिमाग में। यह भी तो एक पहलू है जिसे ध्यान में रखना कितना ज़रूरी है। इस बात से Stalker फ़िल्म की यह कविता याद आ गयी, अब तो इसका महत्व और भी बढ़ गया :

“Let everything that’s been planned come true.

Let them believe.

And let them have a laugh at their passions.”

— ये प्रार्थना है एक।

“Let them believe in themselves.

Let them be helpless like children.

Because weakness is a great thing, and strength is nothing.”

 

— क्यूँकि कमज़ोरी में तो तुम तरल होते हो, कमज़ोर समय में तुम ज़्यादा महसूस करते हो, ज़्यादा अनुभव करते हो, ज़्यादा सोखते हो। और वो पात्र यह पँक्तियाँ फ्रेम में पानी के ज़रिए कहता है। क्यूँकि पानी ही तो सर्जन करता है। जीवन पानी से ही शुरू हुआ..उसी से उपजा है और पानी तरल होता है। ठोस के मुकाबले तरल में आसानी से और चीजों के लिए जगह बनाई जा सकती है। आशा और विश्वास के लिए भी क्यूँकि कमज़ोर समय में तुम आशा ही तो करते हो ना। तुम्हें विश्वास होता है। क्यूँकि बस यही चीज़ें तो बची होती है तुम्हारे पास।

– एहसास तरल होते हैं। पानी की तरह। कमज़ोर समय में हम भी तरल होते हैं। तरलता में जीवन ज़्यादा करीब से जी पाते हैं। और तरलता में हमारी पकड़ से परे की चीज़ों के लिए जगह होती है। इसीलिए हमारा कमज़ोर समय हमें बदल देता है, एक नए दृष्टिकोण के साथ हम फ़िर से जन्म लेते हैं। यह सुंदर है। आत्मा में विस्फ़ोट!!!

 – Water

  it evaporates, it breaks down

  it dissolves.

  but it remains— Always.

– Eternal..आशा और विश्वास की तरह!!

– हाँ!! और यहाँ ये music के बारे में देखो तुम। कैसे आवाज़ को उस दृश्य के ऊपर डाला है। यह ऐसा लगा कि तुम इस पानी से भरी पूरी झील को देख रहे हो और कोई तुमसे यह शब्द कह रहा है तुम्हारे कानों में। ताकि तुम्हें वो और गहराई से महसूस हो जो वो कहना चाह रहा – कि अगर तुम इस जगह होते, इस दृश्य को देख रहे होते तो समझते कि ये शब्दों से परे है। यह संगीत है।

 

– संगीत सिर्फ़ आवाज़ें हैं जिन्हें एक लय में.. एक हारमनी में बाँध दिया गया है। लेकिन फ़िर भी यह हमें इस तरह से छूता है भीतर जैसे कुछ और नहीं छू पाता। यह सिर्फ़ मशीनी प्रक्रिया है लेकिन फ़िर भी ऐसा क्या है जो हमारे भीतर इसके जवाब में छिड़ता है.. इससे जुड़ जाता है? उस बच्चे की बात Steamroller and the violin मूवी में की – when it resonates it sounds beautiful. उसकी टीचर उसके संगीत से जुड़ती नहीं है यानी resonate नहीं करती और इसी वजह से उसे उसका संगीत अच्छा नहीं लगता। पर उसके और स्टीमरोलर वाले आदमी के बीच एक जुड़ाव था। दोनों एक दूसरे के सामने vulnerable हुए। और वो आदमी उसकी कला से जुड़ा था.. वो resonate करना जानता था बच्चे की रचनात्मकता से, उसके भावों से जिसकी वजह से उसे उसका संगीत सुंदर लगा – जबकि अभी दो घंटे ही हुए होंगे उसे टीचर से रिजेक्ट हुए यानी उसकी skill बहतर नहीं हुई है – बस एक तालमेल मिला है। भीतर से। एक जुड़ाव मिला है।

– क्यूँकि कला महसूस करने के लिए है और हर उस इंसान के लिए जो उससे जुड़ना जानता है। उस टीचर को उसकी ज़रूरत नहीं थी लेकिन उस स्टीमरोलर वाले आदमी को थी। और तभी सँवाद हुआ कला से।

– संवाद। कला संवाद है अमूर्त से – जिसे हम महसूस कर सकते हैं पर छू नहीं सकते। और यह दो तरफ़ा होता है। अमूर्त हमसे जुड़ने के रास्ते खोजता है और हम उससे। इन दोनों के बीच कला वो दरवाज़ा खोल देती है जहाँ से वो हम तक पहुँच सके और हम उस तक। और तब जो सँवाद होता है, वही तो कला है असल में!!

– विस्फ़ोट! कितनी सुंदर बात कही तुमने!!

 

और यह बात की वो steamroller वाला आदमी वहाँ समझने के लिए नहीं है वो महसूस करने के लिए है। सोचो, क्या हमें भी वो कहानियाँ ज़्यादा पसंद नहीं आती जिन्हें हम महसूस कर पाते हैं – बहुत भीतर तक? भले ही एक बार को वो पूरी तरह समझ ना आए।

जैसे काफ़्का की Metamorphosis इसलिए पसंद आई क्यूँकि हमने वो महसूस करा है की कीड़ा होना कैसा लगता है। और अपने भीतर के बदलाव से कैसे आस पास का सब बदलने लगता है। The Trial इसलिए पसंद आयी क्यूँकि हम सब वो trial रोज झेलते हैं। समझ आए ना आए क्यूँकि तरीका अलग हो सकता है, लेकिन महसूस रोज़ करते हैं। The Castle में भगवान तक पहुँचने की होड़। हम अपने रोज़ के जीवन में उससे गुजरते हैं।

The Castle | Have We Reached There, Yet!

निर्मल वर्मा की कहानियाँ – कुछ ऐसे भाव छूती हैं जिन्हें हम नाम नहीं दे पाते – guilt, जो बीत चुका है उसका।

प्रतिनिधि कहानियाँ – निर्मल वर्मा | निजी खिड़कियां

Samuel Beckett के नाटक – कि असल में हम जीवन भर एक गोल घेरे में ही घूमते रहते हैं बस। यह हम सब ने महसूस किया है बहुत बार। कह नहीं पाते, समझ नहीं पाते पर महसूस कर है बहुत बार।

Waiting For Godot | Play | Game of forever and always

विनोद कुमार शुक्ल – कि असल जादू बड़ी सामान्य चीजों में है। सरलता में है। एक हाथी के आने में, खिड़की में, पहाड़ में, कौए में, हमें बस चश्मा बदलने की ज़रूरत है। यह रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है.. जिया है इसे।

Deewar Me Ek Khidki Rehti Thi | Vinod Kumar Shukla

मानव कौल की कहानियाँ – “आस पास कहीं” जिसमें हम सब जीवन से भाग जाना चाहते हैं। “अभी अभी से कभी तक का” – हमें मूँछें दिखती हैं औरों को नहीं। यानी हम सब को जो जादू हमारी पसन्दीदा चीज़ों में जैसे किताबें या फिल्मों में दिखता है वो दूसरे नहीं देख पाते। घर वाली कहानी  – हम सब घर ढूंढ रहे हैं। “इल्हाम” नाटक – हमें enlightenment चाहिए लेकिन हमें नहीं पता कि हम उसका करेंगे क्या। “मुमताज भाई पतंग वाले” – बचपन का guilt. उन चीज़ों का जो हमने नादानी में, नासमझी में करी थीं। कितने सारे ऐसे guilt हमारे पास इकट्ठा हैं ना?

Wang Kar Wai की Days of being wild मूवी – उससे लोगों को जकड़ के रखने वाली पँक्ति याद आती है बोर्हेस की – “after a time you understand the subtle difference between holding a hand and chaining a soul.” उसमें लड़का और उसकी माँ – chaining a soul का उदाहरण है। और लड़का और लड़की – holding a hand का।

In The Mood For Love | Something Beyond Words

– क्या तुम्हें याद है Avatar मूवी में वो दृश्य जहाँ वो अपनी पूँछ या चोटी जैसा कुछ आपस मे जोड़ते हैं पुरखों के पेड़ के नीचे.. एक दूसरे को सोखते हुए.. अपने से, पुरखों से, सबकी आत्माओं और collective consciousness से जुड़ते हुए.. यह ठीक ऐसा महसूस होता है। मानो एक पेड़ की छाँव में, कहानियों का पेड़ शायद जिसके नीचे इतने सारे धागे.. सब एक दूसरे से जुड़े हुए। सब एक तरफ को जाते हुए।

– हाँ! बिल्कुल! बिल्कुल! सबकी बातें आपस में जुड़ रही। आज तक जो भी कलाकार.. जिनसे हमने प्रेम किया.. सब एक ही बात कह रहे। महसूस करो। Just experience.

कामू ने एक पूरी फिलोसॉफी बना दी की कोई अर्थ नहीं है किसी भी चीज़ का। बस हर पल को जियो। एक्सपीरियंस करो।

– वही ना कि सब अपनी अपनी बात कहना चाहते हैं कला के माध्यम से और basic human level पर सबकी बात एक ही तो होती है। है ना? क्यूँकि हर बात एक्सपीरियंस से आती है – और जीवन तो सबके लिए खुला है। जीने के लिए। एक्सपीरियंस करने के लिए। इसीलिए जो बात मैंने कही वो तुमने भी कभी जी होगी और जो तुमने कही वो मैंने जी होगी। फॉर्म अलग हो सकता है कहने का, जीने का, देखने का लेकिन बात एक ही होती है भीतर।

 

– हाँ!! बिल्कुल!!

और कविताएँ.. सोचो वो भी तो हमसे कहती हैं कि शब्दों में आस्था रखो जो कि बँधे हुए मतलबों के साथ आते हैं लेकिन जिन्हें अगर साथ में एक कविता में रख दिया जाए तो उनसे कुछ ऐसा उपजता है जो अपने से परे है और जिसे सिर्फ़ महसूस करा जा सकता है।

जैसे विनोद कुमार शुक्ल की “हताशा” वाली कविता। इसमें कुछ अलग ही महसूस होता है। कुछ अपने से परे। और यही कला है। जब जो महसूस करा वो उस कृति के मीनिंग से आगे बढ़ जाता है।

– और वो “इन सर्दियों में” कविता मंगलेश डबराल की। क्यूँ यह कविता भीतर से नहीं गयी? क्यूँ जम गई? क्यूँकि यह हम अपने दुख को कैसे महसूस करते हैं इस बारे में है। हम अपने कठिन वक्त के साथ एक अलग तरीके से रहते हैं – खुद के साथ का संबंध। ये हम सब ने कभी न कभी तो महसूस किया है। हम सब इससे गुज़रे हैं। तभी तो हर कोई जुड़ पाया है इससे।

– तुम यह पढ़ो Solaris मूवी के दृश्य में जो लिखा है :

“You love that which you can lose: Yourself, a woman, a homeland. Until today, love was simply unattainable to mankind, to the Earth. There are so few of us. A few billion altogether. A handful! Maybe we’re here to experience people as a reason for love!”

 

मेरे भीतर विस्फ़ोट हो रहे आत्मा में!

– अरे यार! यह बात की हम solaris में लोगों को जीने गए हैं प्रेम को जीने के एक बहाने के तौर पर। यानी तुम Solaris में इसलिए गए जिससे तुम लोगों को appreciate कर सको। उनसे प्रेम कर सको। जो तुम earth पे नहीं कर पाए अपनी नॉर्मल ज़िंदगी में। और वहाँ जाकर तभी तो kris अपनी बीवी से प्रेम कर बैठा जिससे उसे पहले नहीं हुआ था। इससे यह बात सच नहीं हुई की सबसे कठिन दिनों में ही तो आप प्रेम कर पाते हो अपने जीवन से, उसमें आए लोगों से।

– ये सुख है!! इससे कविता याद आ गयी गीत चतुर्वेदी की :

“जब मुश्किल समय आए,

सब कुछ बेकाबू हो जाए,

उससे थोड़ा और प्रेम करना

जिससे अभी तक करते हो आए।”

और यह भी आशा, इंतज़ार और विश्वास के बारे में बात करते हैं…ये सुंदर लोग हैं।

– क्या Ship of Theseus भी इसी बारे में नहीं थी??

आनंद गाँधी की बातें सुनकर नहीं लगता कि ये आदमी आशा में विश्वास करता है। और वही दिखाना चाहता है अपनी फिल्मों में भी। Ship of Theseus के अंत में भी यही हुआ कि एक आदमी इतने लोगों को आशा दे गया।

– हाँ! मैं कह रहा हूँ ना : मानव कौल, निर्मल वर्मा, कुँवर नारायण, काफ़्का, सैमुएल बैकेट, आयन रैंड, स्टेनली क्यूबरिक, इम्तियाज़ अली, तारकोविस्की, गीत चतुर्वेदी, आनंद गाँधी, विनोद कुमार शुक्ल – ये लोग अभी तक के जीवन के checkpoints जैसे हैं। इन्होंने जीवन उथल पुथल कर दिया है।

– तुम्हें पता है, तुम दुनिया की सबसे सुंदर आत्मा हो इस क्षण में। तुम प्रेम में हो.. इस जीवन से। आशा से।

– हाँ! हम दोनों ही। बहुत ज़्यादा!

सुनो, क्या हम दोनों zone में हैं? क्या हम stalker हैं?

(वो अपने आस पास देखते हैं। घने जंगल में घास पर लेटे हुए, उन्हें Stalker के शब्द कहीं गहरे पानी की बूँदों से गूँजते हुए सुनाई देते हैं।)

 

– Stalker भी zone में ऐसे ही घास पर लेट जाता था ना?

– हाँ! और उसके चेहरे पर कितना सुख होता था मानो बहुत सूखे में किसी ने गटागट पानी पिला दिया हो।

– एक बात बताओ..जीवन में ऐसे बहुत से दिन रहे होंगे ना जिनमें हम बहुत खुश थे, संतुष्ट थे। सबके जीवन में होते हैं। जब तुम बस अकेले बैठ कर या फिर दोस्तों के साथ कुछ नहीं सोच रहे होते हो.. बस महसूस कर रहे होते हो। निजी सब्जेक्टिव अनुभव।

– हाँ, बिल्कुल। जैसा तुमने कहा यह तो सबके जीवन में होता है।

– तो अब ज़रा इसके बारे में सोचो.. की कितने ऐसे दिन हैं जिन पर हम उँगली रखकर कह सकते हैं उनकी पूरी याददाश्त के साथ कि हम इतना खुश.. संतुष्ट.. या कैसा भी सुख महसूस कर रहे थे उस दिन। सिवाय कुछ बड़ी घटनाओं के..बाकी के दिनों पर हम उँगली रखकर नहीं कह सकते की हाँ इस दिन हम खुश थे। क्यूँकि वो हमें याद ही नहीं हैं।

 

मतलब जो हम जीते हैं, experience करते हैं- purely an experience. एक अनुभूति.. जिसको हम बांधते नहीं.. जिसमें कुछ नहीं सोचते.. बस जीते हैं.. वो हम कभी याद नहीं रख पाते। ठीक उस सटीकता से नहीं जिससे हमें दूसरी चीज़ें याद रहती हैं। लेकिन हम ठीक वैसी ही अनुभूतियों को बार बार जीते हैं.. वैसे ही खुशहाल दिन और हर बार ऐसे की पहली बार जी रहे हों। बिल्कुल नए की तरह। बस एक धुँधली सी याद ज़रूर रहती है दिमाग में पीछे कहीं की हाँ जीवन में कई बार ठीक ऐसे ही अच्छा महसूस किया है। सुंदर महसूस किया है।

यह अजीब नहीं है? कैसे हमारा दिमाग, याददाश्त और खयाल काम करते हैं।

– हाँ! क्यूँकि हम उन पलों को भीतर सोख लेते हैं। उस जिए हुए को। हम उन्हें जीने में इतने डूबे होते हैं.. इतने रमे हुए होते हैं उस वक़्त की वो याद ही नहीं रहते। जहाँ हम असल में इस तरह रम नहीं पाते.. जहाँ हम lack करते हैं जीना वो ही तो याद रहता है। किसी टीस सा चुभता हुआ। वही ना कि कोई चीज़ हम मिस तभी करते हैं जब वो नहीं होती। जब पास होती है तो उसे भरपूर जीने में इतने डूबे होते हैं कि उसे जीना याद नहीं रख पाते। हम तब संतुष्ट होते हैं, एक तरह से पूरे। ऐसे ही पल तो हमारी आत्मा की रोशनी बन जाते हैं। हमें सुंदर बनाते हैं।

 

– अरे हाँ! मैं यही तो कहना चाह रही थी कि हम उन रोज़मर्रा के रूटीन दिनों को कभी ठीक से याद नहीं रख पाते लेकिन भीतर ही भीतर यह एहसास हमेशा रहता है कि हाँ हमने बहुत से ऐसे दिन जिए हैं जिनमें हम खुश थे। और इन्हीं के सहारे तो हम आगे बढ़ते रहते हैं।

– और यह एक तरह से अच्छा है मेरे खयाल से। क्यूँकि जब हम वापिस ऐसे ही खुशी भरे पल जीते हैं तो वो एकदम नए लगते हैं जबकि दर्द या पीड़ा, उनसे एक जाना पहचाना सा सम्बंध बना रहता है। और यह ज़रूरी भी है क्यूँकि तब हम पीड़ा से ज़्यादा सहज हो पाते हैं.. यह बीत जाएगा कि हिम्मत मिलती है क्यूँकि हम पहले भी इससे उबर चुके हैं यह बात हमें पता है। और जब खुशी आती है हर बार नए की तरह तो हम उसके.. इस जीवन के.. और भी ज़्यादा शुक्रगुज़ार होते हैं।

– विस्फ़ोट! विस्फ़ोट! विस्फ़ोट! यह दुनिया कितनी सुंदर है!!!

– हैं ना?! मैं तो कह ही रहा था की तुम्हें प्यार हो जाएगा।

और यह देखो, Stalker मूवी में कविता की पँक्ति.. यह कितनी सटीक बैठती है ना यहाँ.. जैसे ठीक इसी पल के लिए लिखी गयी हो :

“Day, like glass, washed all clear. Only that was not enough.”

 

यह विश्वास के बारे में है ना? की कुछ और है अपने से परे महसूस करने के लिए, जीने के लिए, जो है उससे बहतर का सपना देखने के लिए, जो इस यथार्थ से भी ज़्यादा सुंदर है। वही की यथार्थ तो झूठ है, कल्पना ही सच है।

– Tarkovsky सुंदर आदमी है। Stalker मेरी अब तक कि सबसे पसंदीदा फ़िल्म है। Steamroller and the violin एक experience है। जो भीतर से कभी जाएगा नहीं। और यह जीवन.. ? यह इस वक़्त सुंदर है! आशा से भरा!

– चलें अब?

– हाँ।

– मिलते हैं।

(दोनों साथ में कहते हैं। आसमान में देख कर एक गहरी साँस लेते हैं और फ़िर वहीं सो जाते हैं। जीवन बहुत सुंदर है, और भी सुंदर हो सकता है कि आशा भीतर लिए।)

Favourite Lines from Tartkovsky’s Films

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